हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की मेहनत और सामूहिक प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं। कांगड़ा जिले के बैजनाथ उपमंडल के धानग गांव की स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने ब्राह्मी की खेती के जरिए आत्मनिर्भरता की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा अब दूर-दूर तक हो रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और औषधीय फसलों को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही योजनाओं का लाभ उठाकर इन महिलाओं ने अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार सृजन का भी सफल मॉडल तैयार किया है।
धानग गांव की महिलाओं ने बताया कि कुछ वर्ष पहले तक उन्हें ब्राह्मी की खेती के बारे में बहुत कम जानकारी थी और इस फसल के लिए कोई निश्चित बाजार भी उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने छोटे स्तर पर इसकी खेती शुरू की। शुरुआती दौर में करीब 1300 पौधे लगाए गए, लेकिन पहले वर्ष अपेक्षित सफलता नहीं मिली। उत्पादन कम रहा, फिर भी महिलाओं ने हार नहीं मानी और लगातार प्रयास जारी रखे।

उचित तकनीकी मार्गदर्शन, नियमित देखभाल और सामूहिक मेहनत के परिणामस्वरूप आज ब्राह्मी की खेती गांव की पहचान बन चुकी है। खेतों में लहलहाती ब्राह्मी की फसल अब अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है। वर्तमान में कई स्वयं सहायता समूह इस खेती से जुड़े हुए हैं और इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है।
धानग गांव के दुर्गा शक्ति, जागृति, लक्ष्मी और प्रेरणा स्वयं सहायता समूह की महिलाएं इस खेती के माध्यम से आर्थिक रूप से मजबूत हुई हैं। महिलाएं केवल ताजा ब्राह्मी बेचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इससे कैंडी, शरबत, स्वास्थ्यवर्धक पेय, औषधीय उत्पाद और अन्य मूल्यवर्धित वस्तुएं भी तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों की बाजार में अच्छी मांग है, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
महिलाओं ने बताया कि खेतों में खाली पड़ी भूमि के बेहतर उपयोग की सोच से ब्राह्मी की खेती की शुरुआत हुई। उन्होंने विभिन्न विभागों और अधिकारियों से संपर्क किया तथा सीएसआईआर के सहयोग से पौधे प्राप्त कर खेती शुरू की। यह पहल आज एक सफल आजीविका मॉडल के रूप में स्थापित हो चुकी है।

ब्राह्मी की खरीद से जुड़े स्थानीय किसान गोविंद सिंह ने बताया कि शुरुआत में बाजार उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती थी। धीरे-धीरे कई कंपनियों ने स्वयं संपर्क करना शुरू किया और खरीद की इच्छा जताई। एक प्रमुख कंपनी ने पूरे उत्पादन को खरीदने का आश्वासन दिया, जिससे महिला किसानों का उत्साह और बढ़ा।
उत्पादन के आंकड़े भी इस सफलता की कहानी बयां करते हैं। पहले वर्ष केवल 12 किलोग्राम उत्पादन हुआ, दूसरे वर्ष यह बढ़कर 70 किलोग्राम और तीसरे वर्ष 122 किलोग्राम तक पहुंच गया। वर्तमान में वर्ष में तीन बार फसल की कटाई की जा रही है, जिससे किसानों को नियमित आय प्राप्त हो रही है।
महिलाओं द्वारा उत्पादित ताजा ब्राह्मी हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों में भेजी जा रही है, जहां इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों, शरबत, स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों और अन्य उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। ताजा ब्राह्मी 200 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है, जबकि सूखी ब्राह्मी के लिए किसानों को 1 लाख रुपये प्रति क्विंटल तक का मूल्य मिल रहा है। इसके अलावा पौधों की बिक्री से भी अतिरिक्त आय अर्जित की जा रही है।
वर्ष 2022 में जहां केवल दो स्वयं सहायता समूह इस अभियान से जुड़े थे, वहीं आज कई समूह ब्राह्मी उत्पादन का हिस्सा बन चुके हैं। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ-साथ उनका आत्मविश्वास और सामाजिक भागीदारी भी बढ़ी है।

महिलाएं विभिन्न मेलों, प्रदर्शनियों और स्थानीय आयोजनों में अपने उत्पादों का प्रदर्शन कर रही हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय के साथ व्यापक पहचान भी मिल रही है। ब्राह्मी आधारित उत्पादों की बढ़ती मांग ने ग्रामीण महिलाओं के लिए उद्यमिता के नए अवसर पैदा किए हैं।
उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि धानग गांव की महिलाएं पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उन्होंने बताया कि सीएसआईआर-आईएचबीटी के सहयोग से चार स्वयं सहायता समूह प्रतिवर्ष लगभग 125 क्विंटल ब्राह्मी का उत्पादन कर अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) जैसी योजनाओं का लाभ उठाकर महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं।
उपायुक्त ने कहा कि भविष्य में ब्राह्मी उत्पादन के साथ-साथ उसकी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की दिशा में भी प्रयास किए जाएंगे ताकि महिलाओं को अपने उत्पादों का और बेहतर मूल्य मिल सके। उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयास, दृढ़ संकल्प और सरकारी योजनाओं के प्रभावी उपयोग से आर्थिक और सामाजिक बदलाव संभव है, जिसका जीवंत उदाहरण धानग गांव की महिलाएं हैं।
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