हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कृषि विभाग के एक अधिकारी को सेवा से बर्खास्त करने के फैसले को अनुचित करार देते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने बर्खास्तगी के आदेश को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया। हाईकोर्ट ने माना कि अधिकारी की 19 वर्ष की लंबी सेवा और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए सीधे बर्खास्तगी की सजा बेहद कठोर थी और यह समानुपातिकता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं थी।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने यह फैसला रक्ष पाल के मामले में सुनाया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सेवा से बर्खास्तगी सबसे कठोर सजा है। इसका असर केवल कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उसके आश्रित परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर भी पड़ता है। इसलिए ऐसी सजा का इस्तेमाल केवल बेहद गंभीर मामलों, जैसे भ्रष्टाचार या धोखाधड़ी, में किया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कर्मचारी को बर्खास्तगी की तारीख से नियमानुसार सभी परिणामी वित्तीय लाभ आठ सप्ताह के भीतर प्रदान करने के निर्देश भी दिए हैं।
क्या है पूरा मामला
अगस्त 2018 में याचिकाकर्ता का तबादला कांगड़ा जिले के देहरा से लाहौल-स्पीति के काजा किया गया था। अधिकारी ने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों और पत्नी के ज्वालामुखी में कार्यरत होने का हवाला देते हुए तबादले के खिलाफ ट्रिब्यूनल, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इस दौरान वह लंबी अवधि तक ड्यूटी पर शामिल नहीं हुए।
इसके बाद विभागीय जांच हुई और नवंबर 2019 में अनुशासनिक प्राधिकरण ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। इस फैसले को बाद में एकल जज ने भी बरकरार रखा था। इसके बाद अधिकारी ने खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी।
19 साल की बेदाग सेवा और पारिवारिक मजबूरियों को माना अहम
खंडपीठ ने माना कि कर्मचारी को प्रशासनिक आदेशों का पालन करना चाहिए था, लेकिन 19 वर्ष की बेदाग सेवा के बाद सीधे बर्खास्तगी की सजा देना कानून में निहित समानुपातिकता के सिद्धांत के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि विभाग के पास वेतन वृद्धि रोकने या निचले ग्रेड में पदावनति जैसी अन्य प्रमुख सजाएं देने के विकल्प भी मौजूद थे।
अदालत ने अधिकारी की पारिवारिक परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना। उसके घर में वृद्ध और बीमार मां, टीबी से पीड़ित सास और गले के कैंसर से जूझ रहा बच्चा था। हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में अदालतों का दरवाजा खटखटाना और ड्यूटी से अनुपस्थित रहना दुर्भावनापूर्ण रवैये का परिणाम नहीं, बल्कि पारिवारिक मजबूरियों से जुड़ा था।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के फैसले को रद्द कर दिया और इसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया। साथ ही अधिकारी को नियमानुसार परिणामी वित्तीय लाभ देने के निर्देश जारी किए गए हैं।




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