Kangra: 4 साल बाद भी अधूरी बहाली! कांगड़ा घाटी रेल मार्ग पर सिर्फ 2 ट्रेनें, यात्रियों ने रेल मंत्री से लगाई गुहार

कांगड़ा घाटी रेलवे मार्ग पर ट्रेनों की सीमित बहाली को लेकर यात्रियों और स्थानीय संगठनों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। एक यात्री संगठन और कांगड़ा घाटी के कई स्थानीय यात्रियों ने केंद्रीय रेल मंत्री Ashwini Vaishnaw से पठानकोट-बैजनाथ नैरो गेज रेल मार्ग पर सभी सात जोड़ी ट्रेनों को जल्द बहाल करने की मांग की है। उनका कहना है कि फिलहाल केवल दो जोड़ी ट्रेनों के संचालन से यात्रियों को भारी भीड़ और असुरक्षित यात्रा का सामना करना पड़ रहा है।

164 किलोमीटर लंबा यह ऐतिहासिक नैरो-गेज रेल मार्ग बाढ़ और भूस्खलन से हुए भारी नुकसान के कारण लगभग चार वर्षों तक बंद रहा। ट्रेन सेवाएं बंद होने से पहले इस रूट पर सात जोड़ी ट्रेनें संचालित होती थीं, जो पठानकोट और बैजनाथ पपरोला के बीच पड़ने वाले करीब 20 कस्बों के लोगों के लिए जीवनरेखा मानी जाती थीं।

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रेलवे अधिकारियों के अनुसार अगस्त 2022 में हिमाचल प्रदेश में हुई भारी बारिश और बाढ़ के कारण चक्की नदी पर बना ब्रिटिश काल का पुल संख्या 32 बह गया था। इसके अलावा कई स्थानों पर भूस्खलन से रेल ट्रैक को भी भारी नुकसान पहुंचा था। सुरक्षा कारणों से रेल सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल दो ट्रेनों का संचालन बहाल कर दिया गया है और अन्य ट्रेनों को चरणबद्ध तरीके से शुरू किया जाएगा।

करीब चार साल बाद 2 जून 2026 को इस रेल मार्ग पर दो ट्रेनों का संचालन दोबारा शुरू हुआ था। इस दौरान सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री Anurag Thakur ने अन्य नेताओं के साथ ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इसके एक दिन बाद पठानकोट और नूरपुर के बीच तीसरी ट्रेन भी शुरू की गई, जिससे लोगों को उम्मीद जगी थी कि शेष चार जोड़ी ट्रेनें भी जल्द बहाल कर दी जाएंगी। हालांकि, 10 जून को उत्तर रेलवे ने परिचालन संबंधी बाधाओं और आवश्यक रखरखाव कार्य का हवाला देते हुए तीसरी ट्रेन को भी बंद कर दिया।

कांगड़ा घाटी रेलवे संघर्ष समिति के अध्यक्ष पी.सी. विश्वकर्मा ने कहा कि तब से रेलवे बोर्ड और जम्मू मंडल के वरिष्ठ अधिकारी बाकी ट्रेनों की बहाली को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में चल रही दोनों ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ रहती है और कई यात्रियों को कोच के दरवाजों पर खड़े होकर सफर करना पड़ता है, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा बना रहता है। चूंकि यह नैरो गेज लाइन है, इसलिए प्रत्येक ट्रेन में केवल छह डिब्बे ही लगाए जाते हैं।

विश्वकर्मा ने यह भी कहा कि मौजूदा ट्रेनों का समय यात्रियों के लिए बेहद असुविधाजनक है। एक ट्रेन सुबह 5 बजे और दूसरी सुबह करीब 7 बजे पठानकोट से रवाना होती है, जबकि वापसी में ट्रेनें दोपहर और शाम के समय चलती हैं, जिससे दैनिक यात्रियों को भारी परेशानी होती है।

जहां रेलवे प्रशासन ट्रेनों की बहाली में देरी का कारण परिचालन बाधाओं और रखरखाव कार्य को बता रहा है, वहीं स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीति और कर्मचारियों की कमी भी इसके पीछे एक बड़ा कारण हो सकती है। कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि रेलवे अधिकारियों ने लोको पायलट और अन्य स्टाफ की कमी का हवाला दिया है। वहीं संघर्ष समिति का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण भी सभी ट्रेन सेवाएं बहाल नहीं की जा रही हैं।

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