कुल्लू दशहरा में 7 दिन तपस्वी जैसी जिंदगी जीते हैं देवताओं के कारकून, खानपान से लेकर रहने तक के कड़े नियम

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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं की मौजूदगी के बीच देव परंपराओं का निर्वहन करने वाले कारकूनों की जीवनशैली भी बेहद अनूठी होती है। उत्सव के सात दिनों तक देवताओं के मुख्य कारकून तपस्वियों की तरह जीवन बिताते हैं। देव नियमों में बंधे इन कारकूनों को अपने आराध्य के अस्थायी शिविर में रहकर चाकरी करनी पड़ती है। उनके रहने और खानपान से लेकर दैनिक दिनचर्या तक के नियम निर्धारित होते हैं। कारकून शिविर में तैयार किया गया भोजन ही खाते हैं और परंपरा के अनुसार बाहर होटल या ढाबों में चाय-पानी तक लेने से परहेज करते हैं।

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इस बार कुल्लू दशहरा उत्सव में जिलेभर से 315 से अधिक देवी-देवता पहुंचे हैं। इनके साथ हजारों कारकून भी देव परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। देव समाज से जुड़े लोगों के अनुसार, प्रत्येक देवता के साथ करीब चार से पांच मुख्य कारकून होते हैं, जिन्हें इन नियमों का पालन करना पड़ता है। इनमें कारदार, पुजारी, गूर, पुरोहित और कायथ कारकून शामिल हैं। इन सभी को दिन-रात देवता के शिविर में रहकर सेवा और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभानी होती है।

देवता के मुख्य कारकूनों के लिए दशहरा उत्सव के सात दिन सामान्य दिनचर्या से पूरी तरह अलग होते हैं। उन्हें अपने कुलज के शिविर में ही भोजन तैयार कर खाना पड़ता है। उत्सव के दौरान लगातार देवता के साथ रहना, उनकी सेवा करना और धार्मिक परंपराओं का पालन करना उनकी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में उन्हें अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं और रोजमर्रा की दिनचर्या को भी देव नियमों के अनुरूप ढालना पड़ता है।

देव समाज के जानकार एवं कारदार भागे राम राणा, शेर सिंह और अमर सिंह के अनुसार, कुल्लू दशहरा में देव परंपराओं का पालन सर्वोपरि है। देवता के मुख्य कारकूनों को निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलना पड़ता है। मान्यता है कि नियमों में लापरवाही होने पर देवता नाराज हो सकते हैं और इसके निवारण के लिए धार्मिक अनुष्ठान करवाने पड़ते हैं।

जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने कहा कि कुल्लू दशहरा में देवताओं के मुख्य कारकूनों के लिए सात दिन तक नियमों का पालन करना बड़ी जिम्मेदारी होती है। उन्हें रहने और खाने-पीने से जुड़ी कई बंदिशों के बीच अपने देवता की सेवा करनी पड़ती है। यह व्यवस्था देव परंपराओं के प्रति उनकी आस्था, अनुशासन और समर्पण को दर्शाती है।

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