धर्मशाला, 23 जून। हर बच्चे की पहली सीख उसके माता-पिता से शुरू होती है। माता-पिता अपने बच्चों की हर जरूरत पूरी करने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं, लेकिन यह सौभाग्य हर बच्चे को नहीं मिल पाता। हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे बच्चे हैं, जिनके सिर से बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया। ऐसे बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए उन्हें “चिल्ड्रन ऑफ स्टेट” का दर्जा दिया है।
इस पहल के तहत सरकार इन बच्चों के अभिभावक की भूमिका निभा रही है। सरकार न केवल उनकी शिक्षा और पालन-पोषण का खर्च उठा रही है, बल्कि उन्हें जेब खर्च, भ्रमण, प्रतियोगी परीक्षाओं की निःशुल्क कोचिंग और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध करवा रही है, ताकि उन्हें कभी यह महसूस न हो कि उनके माता-पिता उनके साथ नहीं हैं।

प्रदेश सरकार 27 वर्ष की आयु तक ऐसे बच्चों की शिक्षा, पालन-पोषण और अन्य जरूरतों का ध्यान रख रही है। इसके अलावा नीट और जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग और अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध करवाई जा रही है। योजना के तहत अनाथ बच्चों, निराश्रितों और एकल महिलाओं को विभिन्न प्रकार की आर्थिक सहायता दी जाती है।
18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए छात्रावास सुविधा और शिक्षा हेतु एक लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। विद्यार्थियों को प्रतिमाह 4 हजार रुपये जेब खर्च के रूप में प्रदान किए जाते हैं। साथ ही, पिकनिक और शैक्षणिक भारत भ्रमण की सुविधा भी दी जाती है। स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए पात्र विद्यार्थियों को स्टार्ट-अप शुरू करने के लिए दो लाख रुपये तक की सहायता मिलती है। शादी के लिए दो लाख रुपये तक का अनुदान और घर बनाने के लिए तीन बिस्वा जमीन भी उपलब्ध करवाई जाती है। 18 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को छात्रावास और कोचिंग के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये की सहायता भी दी जा रही है।
धर्मशाला के दाड़ी गांव की रहने वाली योजना की लाभार्थी दीक्षा बताती हैं कि बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था। परिवार में केवल वह, उनका बड़ा भाई और बीमार दादी रह गए थे। आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी और रहने के लिए उचित घर भी नहीं था। सुख आश्रय योजना के तहत उन्हें मकान निर्माण के लिए आर्थिक सहायता मिली, जिससे उन्होंने अपने पुराने घर की मरम्मत करवाई और दो नए कमरे बनाए। आज पूरा परिवार सुरक्षित और सम्मानपूर्वक अपने घर में रह रहा है।
धर्मशाला के पास्सू गांव के अमित कुमार का कहना है कि मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना उनके जैसे युवाओं के लिए बड़ी मदद साबित हो रही है। उन्होंने घर निर्माण के लिए आवेदन किया था और उन्हें पहली किस्त के रूप में एक लाख रुपये की सहायता मिल चुकी है, जिससे उन्होंने अपने घर के चार कमरों का निर्माण शुरू कर दिया है।
वहीं, धर्मशाला के समीप रजोल की रहने वाली जयंतिका कहती हैं कि माता-पिता के निधन के बाद उन्हें और उनके भाई को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके पास रहने के लिए अपना घर भी नहीं था। सुख आश्रय योजना के तहत मिली आर्थिक सहायता से अब उनका अपना घर बन चुका है और वे सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे हैं।
जिला कार्यक्रम अधिकारी (महिला एवं बाल विकास) अशोक शर्मा ने बताया कि मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना के तहत जिला कांगड़ा में मई 2026 तक 27 वर्ष तक की आयु के 719 बच्चों को सामाजिक सुरक्षा के रूप में लगभग 57 लाख रुपये की वित्तीय सहायता दी जा चुकी है। इसके अलावा टोंग लेन ट्रस्ट में रह रहे करीब 200 बच्चों को भी 6.25 लाख रुपये की सहायता प्रदान की गई है। इन बच्चों को प्रतिमाह 500 रुपये उत्सव भत्ता भी दिया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि गृह निर्माण सहायता के लिए इस वर्ष अब तक 36 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिन्हें प्रति लाभार्थी तीन लाख रुपये की सहायता स्वीकृत की गई है। प्रथम किस्त के रूप में प्रत्येक लाभार्थी को एक-एक लाख रुपये जारी किए जा चुके हैं। जिला में दो “चिल्ड्रन ऑफ स्टेट” को घर निर्माण के लिए भूमि भी उपलब्ध करवाई गई है।
उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा ने कहा कि मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की एक संवेदनशील और अभिनव पहल है, जो समाज के कमजोर वर्ग के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि सरकार इन बच्चों को केवल सहायता नहीं दे रही, बल्कि उनके अभिभावक की भूमिका निभाते हुए उनके शिक्षा, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की जिम्मेदारी भी उठा रही है।
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