सोलन: मशरूम की खेती करने वाले किसानों के लिए हिमाचल प्रदेश के सोलन से बड़ी खबर सामने आई है। मशरूम अनुसंधान एवं निदेशालय (डीएमआर) सोलन ने ढिंगरी मशरूम की पिंक प्रजाति का हाईब्रिड बीज तैयार कर ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे फसल महज आठ दिन में तैयार हो सकेगी। अभी ढिंगरी मशरूम की फसल तैयार होने में करीब 28 से 40 दिन लगते हैं। नई तकनीक से किसान कम समय में अधिक उत्पादन ले सकेंगे और एक महीने में दो से तीन क्रॉप तक लेने की संभावना है। इससे किसानों की पैदावार के साथ आमदनी बढ़ने की भी उम्मीद है।

एक साल के शोध के बाद मिली सफलता
इस तकनीक पर पिछले एक वर्ष से शोध चल रहा था, जिसमें अब सफलता मिली है। ढिंगरी मशरूम अपने स्वाद के साथ औषधीय और पौष्टिक गुणों के लिए भी जानी जाती है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसी वजह से देश-विदेश के बड़े होटलों और रेस्टोरेंट में इसकी मांग बनी रहती है। बाजार में ढिंगरी मशरूम की कीमत करीब 100 से 200 रुपये प्रति किलो तक रहती है।
बटन मशरूम के बाद देश में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली प्रजाति ढिंगरी मशरूम है। भारत में हर साल 3,010 मीट्रिक टन से अधिक मशरूम का उत्पादन होता है, जिससे लगभग 4 अरब रुपये से अधिक का कारोबार होता है। हिमाचल प्रदेश में अकेले मशरूम से करीब 2 करोड़ रुपये का कारोबार किया जाता है।

मसालों के अपशिष्ट पर भी ढिंगरी मशरूम उगाने का शोध
डीएमआर के वैज्ञानिक इससे पहले औषधीय पौधों के अपशिष्ट पर ढिंगरी मशरूम उगाने का सफल प्रशिक्षण कर चुके हैं। अदरक और तुलसी के अपशिष्ट पर किए गए शोध में सफलता मिली थी और करीब 28 से 32 दिन बाद क्रॉप तैयार हुई थी। अब खुंब अनुसंधान निदेशालय की ओर से मसालों के अपशिष्ट पर ढिंगरी मशरूम उगाने का शोध भी किया जा रहा है।
इस तकनीक के सफल होने पर मशरूम खाने वालों को प्रोटीन के साथ जीरा, सौंफ और धनिया के औषधीय गुण भी मिल सकेंगे। इस दिशा में डीएमआर के विशेषज्ञ राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएसएस), अजमेर के साथ मिलकर शोध कर रहे हैं। शोध सफल होने के बाद देशभर के मशरूम उत्पादकों और किसानों को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी।

आठ दिन में आई क्रॉप पहले की तकनीक से दोगुनी
डीएमआर के कार्यकारी निदेशक डॉ. ब्रिज लाल अत्री ने बताया कि ढिंगरी मशरूम का हाईब्रिड बीज तैयार करने में विशेषज्ञों को सफलता मिली है। नई तकनीक से आठ दिन में तैयार हुई क्रॉप पहले इस्तेमाल की जा रही तकनीक की तुलना में दो गुना अधिक रही है। उन्होंने बताया कि यह शोध एक वर्ष बाद पूरा हुआ है।
डॉ. अत्री के अनुसार पहली बार नई पिंक प्रजाति और हाईब्रिड बीज को राष्ट्रीय खुंब मेले में देशभर से आने वाले मशरूम उत्पादकों के सामने प्रदर्शित किया जाएगा। इससे किसानों को कम समय में अधिक उत्पादन लेने वाली इस नई तकनीक के बारे में जानकारी मिल सकेगी।

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