हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: SPU मंडी की JOA IT परीक्षा की होगी SIT जांच, 5 सदस्यीय टीम करेगी निष्पक्षता की पड़ताल

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरदार पटेल विश्वविद्यालय (एसपीयू), मंडी की ओर से आयोजित जूनियर ऑफिस असिस्टेंट (जेओए आईटी) भर्ती की कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (सीबीटी) परीक्षा की निष्पक्षता पर उठे सवालों की स्वतंत्र जांच के लिए एसआईटी गठित करने का आदेश दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने मंडी के पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय एसआईटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। समिति में हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के कम से कम एक सदस्य को भी शामिल किया जाएगा।

मामले की अगली सुनवाई 5 अक्तूबर को होगी और इसी दिन एसआईटी को अपनी जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करनी होगी। अदालत ने जांच के दौरान याचिकाकर्ता मनीष कुमार और निजी प्रतिवादी को भी शामिल करने के निर्देश दिए हैं। एसआईटी को भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए दिशा-निर्देश और सुझाव देने की स्वतंत्रता भी दी गई है। इसका उद्देश्य अधिकारियों के करीबी रिश्तेदारों के परीक्षा में शामिल होने की स्थिति में संभावित हितों के टकराव को रोकना है।

नोडल अधिकारी की पत्नी के चयन पर उठे सवाल

मामला एसपीयू मंडी की जेओए आईटी परीक्षा से जुड़ा है। परीक्षा में विश्वविद्यालय के सेक्शन ऑफिसर एवं नोडल अधिकारी आशीष शर्मा की पत्नी चयनित उम्मीदवारों में शामिल हुईं। याचिकाकर्ता मनीष कुमार ने परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई कि नोडल अधिकारी की भूमिका से परिणाम प्रभावित हुआ हो सकता है।

हालांकि, एसपीयू के कुलसचिव की ओर से अदालत में नोडल अधिकारी का बचाव किया गया। उनका तर्क था कि विश्वविद्यालय ने पहली बार सीबीटी आयोजित की थी और नोडल अधिकारी की भूमिका केवल प्रशासनिक थी। उन्होंने किसी स्वतंत्र या निजी अधिकार का प्रयोग नहीं किया। विश्वविद्यालय के अनुसार प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा संचालन, उत्तरों के मूल्यांकन, मेरिट सूची और अंतिम परिणाम तैयार करने की जिम्मेदारी एनएसईआईटी की थी और इन प्रक्रियाओं में नोडल अधिकारी की कोई भूमिका नहीं थी।

दिव्यांग परीक्षार्थी को स्क्राइब नहीं देने पर राज्य चयन आयोग से जवाब तलब

एक अन्य मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांग परीक्षार्थी को लिखित परीक्षा के दौरान स्क्राइब यानी लेखक की सुविधा नहीं देने पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने विज्ञापन की शर्त 4(13) और नियम 14(ए) के बीच समय-सीमा को लेकर सामने आए विरोधाभास तथा याचिकाकर्ता की शिकायत पर राज्य चयन आयोग के अधिवक्ता को आवश्यक निर्देश प्राप्त करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी।

याचिकाकर्ता विश्व पटियाल ने दिव्यांग श्रेणी के तहत परीक्षा में शामिल होने के लिए स्क्राइब की मांग की थी, लेकिन आयोग ने उनकी मांग खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आयोग ने परीक्षा से केवल तीन दिन पहले, 24 मई 2026 को वेबसाइट पर एडमिट कार्ड उपलब्ध कराया, जबकि परीक्षा 27 मई 2026 को आयोजित की गई थी।

आयोग ने हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग (व्यापार एवं प्रक्रिया) प्रथम संशोधन नियम, 2025 के नियम 14(ए) का हवाला देते हुए स्क्राइब की मांग ठुकराई। आयोग का तर्क था कि परीक्षा से 15 दिन पहले दिव्यांगता प्रमाण पत्र और तीन संभावित स्क्राइब का विवरण देना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि जब एडमिट कार्ड ही परीक्षा से तीन दिन पहले जारी हुआ, तो 15 दिन पहले आवेदन करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। याचिका में विज्ञापन की शर्त 4(13) का हवाला देते हुए कहा गया कि दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को एडमिट कार्ड या रोल नंबर प्राप्त होते ही केंद्र अधीक्षक के समक्ष स्क्राइब के लिए लिखित आवेदन करना था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि एडमिट कार्ड डाउनलोड करते ही उन्होंने आवेदन कर दिया था।

भारतीय एजुकेशन सोसायटी को हाईकोर्ट से राहत

भारतीय एजुकेशन सोसायटी की ओर से दायर दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने संस्थान को राहत दी है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 (सत्र 2026-28) के लिए पात्र कॉलेजों की सूची में संस्थान का नाम तुरंत शामिल किया जाए।

संस्थान को डीएलएड और बीएड पाठ्यक्रमों की चल रही काउंसलिंग प्रक्रिया में प्रोविजनल यानी अनंतिम तौर पर भाग लेने की सशर्त अनुमति दी गई है। दोनों पक्षों की सहमति के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को एनसीटीई अधिनियम, 1993 की धारा 18 के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष चार सप्ताह के भीतर अपील दायर करने की छूट दी है।

यदि अपील चार सप्ताह के भीतर दायर की जाती है, तो उसे समय-सीमा के भीतर माना जाएगा और सक्षम प्राधिकारी उसका निपटारा गुण-दोष के आधार पर करेगा। जब तक सक्षम प्राधिकारी अपील पर कोई फैसला नहीं लेता, तब तक हाईकोर्ट की ओर से समय-समय पर दिए गए सभी अंतरिम आदेश प्रभावी रहेंगे।

यदि याचिकाकर्ता चार सप्ताह की समय-सीमा में अपील दायर नहीं करते हैं, तो उन्हें दी गई कानूनी सुरक्षा चार सप्ताह बाद स्वतः समाप्त हो जाएगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि सत्र 2026-27 के दौरान कोई छात्र इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेता है, तो उसे पहले ही बताया जाएगा कि उसका प्रवेश अपील के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा।

गौरतलब है कि मामला भारतीय एजुकेशन सोसायटी की मान्यता रद्द किए जाने से जुड़ा है। एनसीटीई ने एनसीटीई अधिनियम की धारा 17(1) के तहत भारतीय एजुकेशन सोसायटी के बीएड, डीएलएड और बीपीएड पाठ्यक्रमों की मान्यता रद्द कर दी थी और 2025-26 सत्र से दाखिले रोकने का फैसला सुनाया था।

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