हिमाचल प्रदेश में स्कूल और कॉलेज, जिन्हें शिक्षा के मंदिर कहा जाता है, अब छात्राओं की सुरक्षा को लेकर सवालों के घेरे में हैं। प्रदेश में पिछले तीन वर्षों के दौरान स्कूल और कॉलेज स्तर पर कार्यरत शिक्षकों के खिलाफ छात्राओं से छेड़छाड़ की 24 शिकायतें सामने आई हैं। इनमें से 10 मामले पॉक्सो एक्ट, यौन उत्पीड़न और ‘बैड टच’ जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शिमला और सिरमौर जिलों में सबसे अधिक पांच-पांच शिकायतें दर्ज हुई हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा के लिए व्यवस्थाएं होने के बावजूद शैक्षणिक संस्थानों में इस तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, चंबा, हमीरपुर, कांगड़ा, कुल्लू और सोलन में दो-दो मामले दर्ज किए गए हैं। मंडी में चार, जबकि शिमला और सिरमौर में पांच-पांच शिकायतें सामने आई हैं। कुल 24 मामलों में से 10 को गंभीर श्रेणी में रखा गया है।
इन मामलों की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ आरोपी शिक्षकों के खिलाफ पुलिस केस दर्ज हुए, कुछ को निलंबित किया गया, जबकि कई मामलों में सेवा से हटाने और बर्खास्तगी तक की कार्रवाई हुई। इसके बावजूद कुछ शिकायतें वर्षों से विभागीय जांच और न्यायिक प्रक्रिया में लंबित हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि स्कूलों में छात्राओं की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी हैं और शिकायत दर्ज होने के बाद पीड़ित छात्राओं को न्याय मिलने में इतना समय क्यों लग रहा है।
शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से 2026 के बीच शिक्षण संस्थानों से जुड़े पॉक्सो एक्ट के तहत सात मामले सामने आए। इन मामलों में अलग-अलग स्तर पर दोषी शिक्षकों के खिलाफ सेवा से हटाने, बर्खास्त करने और अन्य सख्त विभागीय कार्रवाई जैसे कदम उठाए गए।
विभागीय रिकॉर्ड के मुताबिक, कांगड़ा जिले में तैनात एक लेक्चरर को 25 मार्च 2025 को सेवा से हटाने और दोबारा जांच के आदेश दिए गए। सिरमौर जिले में तैनात एक लेक्चरर को 29 जुलाई 2025 को बर्खास्त किया गया, जबकि किन्नौर जिले में तैनात एक अन्य लेक्चरर को 31 जनवरी 2026 को सेवा से हटाया गया। वहीं, हमीरपुर जिले में तैनात एक लेक्चरर को 4 जून 2026 को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। इसके अलावा, कांगड़ा में तैनात एक टीजीटी आर्ट्स और मंडी में तैनात एक टीजीटी मेडिकल शिक्षक के मामलों में 20 मई 2026 को निर्णय हुआ। ऊना में तैनात एक टीजीटी मेडिकल शिक्षक के मामले में भी 16 मार्च 2026 को अंतिम निर्णय दर्ज किया गया।
छह जिलों में गंभीर शिकायतें
शिकायतों का दूसरा पहलू यह है कि शिक्षा विभाग में छात्राओं से कथित छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार से जुड़े कई मामले लंबे समय से लंबित हैं। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, हमीरपुर, चंबा, शिमला, कांगड़ा, सिरमौर और सोलन जिलों में शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच अलग-अलग स्तरों पर जारी है।
हमीरपुर जिले में एक स्कूल के तत्कालीन प्रधानाचार्य पर नाबालिग छात्रा को मोबाइल फोन देने, तीन हजार रुपये भेजने और आपत्तिजनक संदेश भेजने के आरोप लगे थे। वर्ष 2019 में मामला सामने आने के बाद विभागीय जांच शुरू की गई। इस मामले में दर्ज दोनों एफआईआर न्यायिक प्रक्रिया में हैं और मामला अतिरिक्त निदेशक स्तर पर लंबित बताया गया है।
शिमला जिले में एक स्कूल के अंग्रेजी प्रवक्ता पर जमा एक की छात्रा के साथ कथित अनुचित व्यवहार के आरोप लगे। उन्हें निलंबित कर दिया गया और विभागीय जांच दोबारा करवाई जा रही है। इस मामले में पुलिस एफआईआर भी दर्ज है। वहीं, कांगड़ा जिले में एक स्कूल के हिंदी प्रवक्ता पर जमा दो की छात्रा से छेड़छाड़ के आरोप लगे। उन्हें भी निलंबित किया गया है और विभागीय व पुलिस जांच जारी है।
सिरमौर जिले में तैनात एक टीजीटी नॉन मेडिकल शिक्षक पर नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ कथित दुर्व्यवहार और शारीरिक दंड देने के आरोप लगे। 25 छात्राओं की ओर से शिकायत का समर्थन किए जाने के बाद शिक्षक को निलंबित कर विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। इसी तरह सोलन जिले में तैनात एक डीपीई पर कई नाबालिग छात्राओं के साथ कथित अनुचित व्यवहार के आरोप लगे थे। वर्ष 2022 में उन्हें निलंबित किया गया और यह मामला अभी विभागीय जांच के अधीन है।
शिमला में शिक्षक को छह साल की सजा
शिक्षण संस्थानों में छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े कुछ मामले अदालत तक भी पहुंचे हैं। शिमला जिले के सुन्नी में एक छात्रा के यौन उत्पीड़न के दोषी शिक्षक को अदालत ने छह साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई। इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि बच्चों के खिलाफ अपराध करने वालों को कानून के तहत सजा दी जा सकती है।
धर्मशाला कॉलेज में छात्रा की मौत से मचा हड़कंप
इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील घटनाओं में से एक धर्मशाला सरकारी डिग्री कॉलेज से सामने आई, जहां रैगिंग और यौन उत्पीड़न से परेशान 19 वर्षीय छात्रा की मौत हो गई। इस मामले में एक प्रोफेसर और तीन छात्राओं के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। इस घटना ने प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्राओं की सुरक्षा, रैगिंग रोकने की व्यवस्था और संस्थान प्रबंधन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
सरकार और शिक्षा विभाग ने क्या कदम उठाए?
सरकार का कहना है कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों से निपटने के लिए कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के तहत इंटरनल कमेटियां गठित की गई हैं। इन समितियों के माध्यम से मिलने वाली शिकायतों की जांच और निपटारा नियमानुसार किया जा रहा है।
स्कूल शिक्षा विभाग समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित कर प्रधानाचार्यों को विभागीय जांच की प्रक्रिया का प्रशिक्षण भी दे रहा है। केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के तहत मामलों की जांच के लिए प्रधानाचार्यों का एक पैनल जांच अधिकारियों के रूप में नियुक्त किया गया है। सरकार के अनुसार, अधिकतर मामलों में कार्रवाई हो चुकी है, जबकि कुछ की जांच अभी जारी है।
हालांकि, नाबालिग बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों में केवल विभागीय जांच पर्याप्त नहीं है। पॉक्सो एक्ट के तहत पुलिस को सूचना देना अनिवार्य है। ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई और आपराधिक जांच की प्रक्रिया अलग-अलग चल सकती है।
दोषी शिक्षकों पर जुर्माने से बर्खास्तगी तक कार्रवाई
स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने बताया कि छात्राओं से छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों पर विभाग की ओर से नियमानुसार कार्रवाई की गई है। उन्होंने कहा कि दोषी पाए जाने वाले शिक्षकों पर जुर्माना लगाने से लेकर बर्खास्तगी, अनिवार्य सेवानिवृत्ति और सेवा समाप्ति तक के कदम उठाए गए हैं। लंबित मामलों में जांच पूरी होने के बाद नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
शिमला के एक सरकारी स्कूल में छठी कक्षा की छात्रा से कथित छेड़छाड़ का मामला सामने आने के बाद परिजनों और महिला संगठनों ने विरोध जताया था। आरोपी शिक्षक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की जिला सचिव सोनिया शबरवाल ने बताया कि शिमला के एक अन्य स्कूल में भी शिक्षक द्वारा छात्रा से छेड़छाड़ का मामला सामने आया था, जिसे समिति ने प्रमुखता से उठाया। फिलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन है।
सोनिया शबरवाल ने कहा कि कई बार पीड़ित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अपनी शिकायत प्रभावी तरीके से नहीं उठा पाते। सामाजिक दबाव के चलते भी अभिभावक चुप रह जाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूलों में बनाई गई कमेटियों के अधिकतर सदस्य उसी स्कूल और शिक्षा विभाग से जुड़े होते हैं, जिससे निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठते हैं। उन्होंने मांग की कि विभागीय कमेटियों के अलावा बाहरी सदस्यों वाली स्वतंत्र कमेटियां भी बनाई जाएं, जिनमें संबंधित स्कूल और विभाग का कोई अधिकारी शामिल न हो। साथ ही, हर कक्षा में सीसीटीवी कैमरे लगाने की व्यवस्था की जाए, ताकि ऐसी घटनाओं की जांच के दौरान ठोस साक्ष्य मिल सकें।
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?
शिमला के आईजीएमसी के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश दत्त शर्मा ने बताया कि कम उम्र में यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं का बच्चों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव हर बच्चे की परिस्थितियों और मानसिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ित बच्चों की काउंसलिंग बेहद जरूरी है, जिससे उन्हें सदमे और मानसिक तनाव से बाहर निकलने में मदद मिलती है।
डॉ. शर्मा के अनुसार, कई बार बच्चों को मनोचिकित्सक के पास काफी देर से लाया जाता है, तब तक समस्या गंभीर हो चुकी होती है। काउंसलिंग के दौरान बच्चे से बातचीत कर उसे सहज बनाया जाता है, ताकि वह बिना किसी डर के अपनी बात रख सके। इसके बाद उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार आगे की मदद दी जाती है।
पीड़ित की पहचान गोपनीय रखना जरूरी
हिमाचल प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष विद्या नेगी ने बताया कि स्कूलों में पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामले सीधे तौर पर आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते, लेकिन जानकारी मिलने पर आयोग इन पर निगरानी रखता है। पुलिस विभाग से कार्रवाई की जानकारी मांगी जाती है और कहीं लापरवाही सामने आने पर सख्ती भी की जाती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे जरूरी पीड़ित बच्चे की पहचान और गोपनीयता सुरक्षित रखना है। कई बार मामले सोशल मीडिया पर तेजी से फैल जाते हैं, जिससे पहले से मानसिक तनाव झेल रहे बच्चे की परेशानी और बढ़ सकती है। उन्होंने स्कूलों की विशेष कमेटियों से शिकायत की गोपनीयता बनाए रखने और पीड़ित बच्चे की काउंसलिंग सुनिश्चित करने की अपील की।
पॉक्सो एक्ट में शिकायत छिपाना भी अपराध
बच्चे के यौन उत्पीड़न की जानकारी मिलने पर पुलिस को सूचित करना अनिवार्य है। पॉक्सो एक्ट की धारा 19 के तहत किसी व्यक्ति को अपराध होने की जानकारी या आशंका होने पर स्थानीय पुलिस अथवा स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट को सूचना देनी होती है।
धारा 21 के तहत अपराध की जानकारी होने के बावजूद रिपोर्ट नहीं करने पर छह महीने तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यदि किसी संस्थान का प्रभारी अपने अधीनस्थ के खिलाफ अपराध की जानकारी छिपाता है, तो उसे एक साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
कानून के तहत पीड़ित बच्चे का नाम, फोटो या ऐसी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती, जिससे उसकी पहचान उजागर हो। बच्चे को जरूरत के अनुसार चिकित्सा, देखभाल, संरक्षण और काउंसलिंग उपलब्ध कराना भी जरूरी है।




For advertisements inquiries on HIM Live TV, Kindly contact us!
Connect with us on Facebook and WhatsApp for the latest updates!


