“मैं उस दिन अयोध्या में था…” 6 दिसंबर 1992 की कारसेवा की यादें सुनाते हुए भावुक हुए शाहपुर के राकेश चौहान

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शाहपुर। 6 दिसंबर 1992 की तारीख भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और संवेदनशील अध्यायों में से एक मानी जाती है। इस ऐतिहासिक दिन को करीब 34 साल बीत चुके हैं, लेकिन शाहपुर निवासी और उस समय बजरंग दल, जिला कांगड़ा के संयोजक रहे राकेश चौहान आज भी उस दौर की यादों को भूला नहीं पाए हैं। जब भी वे अयोध्या कारसेवा के दिनों को याद करते हैं, उनके सामने उस समय की तस्वीरें फिर से ताज़ा हो जाती हैं।

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राकेश चौहान बताते हैं कि विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर देशभर से लाखों रामभक्त अयोध्या पहुंचे थे। कांगड़ा जिले से भी शाहपुर, धर्मशाला, कांगड़ा, नगरोटा और आसपास के क्षेत्रों के कारसेवकों का दल 1 दिसंबर 1992 को अयोध्या के लिए रवाना हुआ था और 3 दिसंबर तक वहां पहुंच गया। 4 दिसंबर तक रामजन्मभूमि क्षेत्र और सरयू नदी के किनारे श्रद्धालुओं और कारसेवकों की भारी भीड़ उमड़ चुकी थी।

उनके अनुसार उस समय पूरे अयोध्या का वातावरण धार्मिक आस्था, उत्साह और जोश से भरा हुआ था। देश के अलग-अलग राज्यों से आए हजारों-लाखों कारसेवक एक ही उद्देश्य के साथ वहां एकत्रित हुए थे। सरयू नदी के किनारे बने अस्थायी शिविरों में ठहरना, संतों के प्रवचन सुनना और रामधुन के बीच बिताए गए वे पल आज भी उनकी स्मृतियों में पूरी तरह जीवंत हैं।

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राकेश चौहान ने बताया कि उस समय उनके साथ पूर्व विधायक स्वर्गीय राम रतन पठानिया, उनके चाचा स्वर्गीय देशराज, धनोटू के स्वर्गीय मेघराज अवस्थी (एडवोकेट), राकेश भारती, दिलीप सिंह ठाकुर, राजकुमार धीमान, रविकांत शर्मा, धर्मशाला के सुनील मनोचा, स्वर्गीय प्रकाश चंद चौधरी सहित जिला कांगड़ा के कई कारसेवक मौजूद थे।

उन्होंने बताया कि 6 दिसंबर 1992 को घटनाक्रम तेजी से बदला। उनके अनुसार बहन साध्वी ऋतंभरा के आह्वान के बाद कारसेवक गुंबद पर चढ़ गए और दिनभर चले घटनाक्रम के बाद शाम करीब पांच बजे बाबरी ढांचा गिर गया। राकेश चौहान का कहना है कि वह उस समय अयोध्या में मौजूद थे और इसे अपने जीवन का सबसे ऐतिहासिक और अविस्मरणीय अनुभव मानते हैं।

करीब 34 साल बाद भी जब वे उन दिनों की तस्वीरें देखते हैं तो अयोध्या की गलियां, सरयू नदी का किनारा, कारसेवकों का उत्साह और वहां का माहौल उनकी यादों में फिर से ताज़ा हो जाता है। उनका कहना है कि यह उनके जीवन का ऐसा अध्याय है, जिसे वे कभी नहीं भूल सकते।

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यह समाचार राकेश चौहान द्वारा साझा किए गए संस्मरण और उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है। 6 दिसंबर 1992 की घटनाएं भारतीय इतिहास का अत्यंत संवेदनशील विषय हैं, जिन पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग ऐतिहासिक और कानूनी व्याख्याएं मौजूद हैं।

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