हिमाचल के इन युवाओं ने बदली कामयाबी की कहानी, खेल से सिनेमा और UN मिशन तक देश-दुनिया में बढ़ाया देवभूमि का मान

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कभी सरकारी नौकरी को ही सफलता का सबसे बड़ा रास्ता मानने वाला हिमाचल प्रदेश का युवा अब अपनी सोच और मंजिल दोनों बदल रहा है। पहाड़ों से निकलकर प्रदेश की नई पीढ़ी खेल के मैदान से लेकर फिल्मी दुनिया, स्टार्टअप, प्रशासनिक सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी पहचान बना रही है। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर हिमाचल के ऐसे ही युवाओं की कहानियां सामने आती हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों, संघर्ष और चुनौतियों के बावजूद अपनी मेहनत से नई पहचान बनाई और देवभूमि का नाम रोशन किया।

रोहड़ू की प्रतिभा रांटा ने बॉलीवुड में बनाई पहचान

शिमला जिले के रोहड़ू की प्रतिभा रांटा ने अपने शानदार अभिनय से बॉलीवुड में अलग पहचान बनाई है। फिल्म लापता लेडीज में मुख्य भूमिका निभाकर उन्होंने दर्शकों और फिल्म जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह फिल्म वर्ष 2025 में ऑस्कर के लिए भी नामित हुई थी। प्रतिभा ने छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक अपने अभिनय का प्रभाव छोड़ा है। प्रीति जिंटा, यामी गौतम और कंगना रणौत के बाद हिमाचल की प्रतिभा रांटा भी बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने वाली युवा प्रतिभाओं में शामिल हैं।

साक्षी शर्मा ने कबड्डी में बढ़ाया हिमाचल का मान

खेलो इंडिया सेंटर राजपुरा की खिलाड़ी साक्षी शर्मा ने छोटे से गांव से निकलकर भारतीय कबड्डी में अपनी पहचान बनाई है। पिछले वर्ष नवंबर में आयोजित वर्ल्ड कप में उन्होंने भारतीय टीम में सफल डिफेंडर की भूमिका निभाई। साक्षी लगातार तीन बार हिमाचल प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड दिला चुकी हैं और वर्तमान में खेलो इंडिया सेंटर राजपुरा में प्रशिक्षण ले रही हैं। हाल ही में प्रदेश की छह महिला खिलाड़ियों का चयन एशियन कबड्डी लीग के लिए हुआ, जिसमें साक्षी शर्मा भी शामिल हैं।

मेजर राधिका सेन ने संयुक्त राष्ट्र में बढ़ाया हिमाचल का गौरव

सुंदरनगर की मेजर राधिका सेन ने भारतीय सेना में सेवा के दौरान अपनी कार्यकुशलता और संवेदनशील नेतृत्व की मिसाल पेश की। संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। वर्ष 2024 में उन्हें मिलिट्री जेंडर एडवोकेट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। राधिका सेन ने लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो के पूर्वी क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के तहत जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ संवाद करते हुए सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम किया। महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने, लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने की उनकी पहल को विशेष रूप से सराहा गया।

निषाद कुमार ने संघर्ष से रचा पैरालंपिक इतिहास

ऊना जिले के निषाद कुमार उन खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने दिव्यांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। वर्ष 2020 के टोक्यो पैरालंपिक में उन्होंने देश के लिए रजत पदक जीता। निषाद का बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता मिस्त्री थे और मां गृहिणी। महज आठ वर्ष की उम्र में पशुओं के लिए चारा काटते समय उनका हाथ मशीन में आने से कट गया।

इसके बावजूद निषाद ने हार नहीं मानी। ऊंची कूद में उन्होंने सामान्य वर्ग की प्रतियोगिता में भी पहला स्थान हासिल किया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण प्रशिक्षण का रास्ता आसान नहीं था। बेटे की मदद के लिए पिता रछपाल सिंह ने सब्जियां उगाईं और मां ने गाय-भैंस पालना शुरू किया, ताकि उनकी डाइट में कमी न रहे। वर्ष 2017 में माता-पिता से 2500 रुपये लेकर निषाद पंचकूला के ताऊ देवी लाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में प्रशिक्षण लेने पहुंचे। उस समय पंचकूला की खेल नर्सरी बंद थी। उनके जुनून को देखते हुए कोच नसीम अहमद ने उन्हें कांप्लेक्स में खाली कमरा उपलब्ध करवाया और प्रशिक्षण शुरू किया।

कड़े प्रशिक्षण के बाद वर्ष 2017 में निषाद ने पंचकूला में आयोजित राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 1.83 मीटर ऊंची कूद में रजत पदक जीता। वर्ष 2019 में दुबई में विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता और 2020 टोक्यो पैरालंपिक के लिए क्वालीफाई किया। टोक्यो पैरालंपिक में उन्होंने ऊंची कूद में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। ऊना जिले के अंब उपमंडल के बदायूं निवासी निषाद ऐसा करने वाले पहले हिमाचली खिलाड़ी बने। उन्होंने 2.06 मीटर की ऊंची कूद लगाकर एशियन रिकॉर्ड भी बनाया।

प्रीति ठाकुर ने यूथ एशियन गेम्स में जीता स्वर्ण

बिलासपुर के कसोल गांव की प्रीति ठाकुर ने कबड्डी के क्षेत्र में हिमाचल का नाम रोशन किया है। वर्ष 2025 में बहरीन में आयोजित तीसरे यूथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय कबड्डी टीम का वह हिस्सा रहीं। इस प्रतियोगिता में हिमाचल से भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करने वाली वह एकमात्र खिलाड़ी थीं।

प्रीति पिछले चार वर्षों से बिलासपुर स्थित राज्य खेल छात्रावास में कबड्डी का प्रशिक्षण ले रही हैं। कबड्डी प्रशिक्षक हंसराज के मार्गदर्शन में उन्होंने खेल की बारीकियां सीखीं और लगातार प्रदर्शन में सुधार किया। वह राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिमाचल का प्रतिनिधित्व करने के साथ स्कूल नेशनल और जूनियर कबड्डी प्रतियोगिताओं में प्रदेश की टीम की कप्तानी भी कर चुकी हैं। खेल के साथ पढ़ाई में भी आगे रहने वाली प्रीति वर्तमान में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बिलासपुर में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं।

चायल के अरुण वर्मा संभाल रहे अंतरराष्ट्रीय कंपनी में MD की जिम्मेदारी

सोलन जिले के चायल क्षेत्र के जखेड़ गांव के रहने वाले अरुण वर्मा ने भी अपनी मेहनत से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। चायल के मिलिट्री स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने एनआईटी सूरत से इंजीनियरिंग और आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए किया। वर्ष 2025 में होइरबिगर ने उन्हें भारत में प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी सौंपी। इनोवेशन और एनर्जी सेविंग के क्षेत्र में काम करने वाली यह कंपनी 40 देशों में कार्य कर रही है।

दिव्यांगता को मात देकर जरूरतमंदों की मदद कर रहे वीरेंद्र सिंह

सिरमौर के लग्नू गांव के वीरेंद्र सिंह की कहानी भी युवाओं के लिए प्रेरणा है। आंखों की रोशनी में परेशानी के कारण वह 40 प्रतिशत दिव्यांगता की श्रेणी में आते हैं, लेकिन उन्होंने इसे अपनी मंजिल के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट के रूप में सेवाएं दे रहे वीरेंद्र राष्ट्रीय स्तर के पैरा धावक हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह देश के लिए एक स्वर्ण और दो रजत पदक जीत चुके हैं।

वीरेंद्र के लिए दौड़ केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं है। उन्होंने एक 14 वर्षीय किडनी पीड़ित बच्ची के इलाज के लिए 26 और 32 किलोमीटर की दौड़ लगाकर 2.50 लाख रुपये जुटाए। इसके बाद धावक सुनील शर्मा के साथ मिलकर 232 किलोमीटर की दौड़ के जरिये 8.45 लाख रुपये जुटाए और पांच गंभीर मरीजों की आर्थिक मदद की। वीरेंद्र अब युवाओं को चिट्टे जैसे घातक नशे के खिलाफ जागरूक कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए उन्होंने शिमला से चंडीगढ़ तक 219 किलोमीटर की दौड़ भी पूरी की।

पिता चलाते रहे ट्रक, बेटी ने ट्रैक पर लिखी सफलता की कहानी

ऊटपुर की 26 वर्षीय धाविका मनीषा ने आर्थिक चुनौतियों के बावजूद खेल के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनके पिता रमेश चंद ट्रक चालक हैं और मां शीला देवी गृहिणी हैं। परिवार की सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद मनीषा ने खेल को अपना लक्ष्य बनाया और लगातार अभ्यास जारी रखा।

अक्टूबर 2025 में रांची में आयोजित अंतरराष्ट्रीय साउथ एशियन गेम्स में मनीषा ने 400 गुणा 4 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीतकर क्षेत्र का नाम रोशन किया। वह वर्तमान में केरल के तिरुवनंतपुरम में प्रशिक्षण ले रही हैं। मनीषा के अनुसार प्रशिक्षण शिविर में रहने और खाने की सुविधा मिलती है, लेकिन खेल से जुड़ी अन्य जरूरतों के लिए पर्याप्त आर्थिक मदद उपलब्ध नहीं हो पाती।

मंडी के गगन प्रदीप शर्मा ने रंगमंच से मुंबई तक बनाई पहचान

मंडी शहर की पुरानी मंडी निवासी गगन प्रदीप शर्मा ने रंगमंच के जुनून को अपना करियर बनाया और मुंबई की मायानगरी तक पहुंचे। आज वह फिल्मों, धारावाहिकों और वेब सीरीज में अभिनय कर रहे हैं। वर्ष 1990 में रंगमंच से जुड़े गगन ने स्कूल-कॉलेज के समारोहों और युवा उत्सवों में अभिनय करते हुए मंच की बारीकियां सीखीं।

वर्ष 2003 से 2019 तक उन्होंने डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में ड्रामा शिक्षक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने अभिनय के साथ युवाओं को रंगमंच से जोड़ने का अनुभव भी हासिल किया। मुंबई में अभिनेता के रूप में सफर शुरू करने के बाद उन्होंने कई फिल्मों, धारावाहिकों और वेब सीरीज में काम किया। मंडी में जागृति कला मंच संस्था का गठन कर उन्होंने स्थानीय कलाकारों को मंच देने का प्रयास भी किया। उनका मानना है कि कलाकार को अवसर मिलने के साथ अपनी जड़ों से भी जुड़े रहना चाहिए। मुंबई में रहते हुए भी वह रंगमंच से जुड़े हुए हैं।

अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर रूस में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे ललित डोगरा

हिमाचल के युवा नेतृत्वकर्ता और एनएसएस राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ललित कुमार डोगरा अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर रूस में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। उन्हें रूस के ट्यूमेन क्षेत्र में 12 से 18 अगस्त तक आयोजित होने वाले न्यू जेनरेशन और डिस्कवर योर रशिया कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय युवा प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया है।

ललित कुमार डोगरा भारत के युवा नेतृत्व, स्वयंसेवा, सामाजिक विकास और शहरी युवा सहभागिता से जुड़े अपने अनुभव वहां साझा करेंगे। उनका यह चयन हिमाचल के युवाओं की बढ़ती भूमिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश की युवा प्रतिभा की पहचान को दर्शाता है।

हिमाचल के युवाओं की ये कहानियां बताती हैं कि सफलता के लिए केवल संसाधन ही जरूरी नहीं होते। मेहनत, आत्मविश्वास, अनुशासन और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। खेल, सिनेमा, सेना, कॉरपोरेट जगत, सामाजिक सेवा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदेश की युवा पीढ़ी जिस तरह आगे बढ़ रही है, वह बदलते हिमाचल की तस्वीर पेश करती है।

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