हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी CBSE स्कूलों में शिक्षकों और प्रिंसिपलों की नियुक्ति एवं तैनाती प्रक्रिया को नियमानुसार जल्द पूरा करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने नियुक्तियां नहीं होने के मामले में राज्य सरकार से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट भी तलब की है। सरकार को रिपोर्ट में स्कूलों में शिक्षकों और प्रिंसिपलों के कुल स्वीकृत पद, वर्तमान में रिक्त पदों की संख्या, उपलब्ध पात्र अभ्यर्थियों और जिनकी नियुक्ति या तैनाती अभी लंबित है, उनका पूरा ब्योरा देना होगा।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने विरेंद्र सिंह और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया। याचिकाकर्ता इन-सर्विस शिक्षक हैं, जिन्होंने सरकारी CBSE स्कूलों में समय पर नियुक्ति और तैनाती की मांग को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियुक्ति और तैनाती की प्रक्रिया में देरी से स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि मामले में अंतरिम आदेश देने का आधार बनता है। पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए 10 दिन के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को मुख्य याचिका के साथ होगी।
अनुकंपा नियुक्ति में नहीं किया जा सकता भेदभाव: हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी की ओर से दायर एलपीए को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने पाया कि विश्वविद्यालय एक तरफ लगातार अनुकंपा के आधार पर नियुक्तियां दे रहा था, जबकि दूसरी तरफ याचिकाकर्ता को सरप्लस स्टाफ का हवाला देकर नौकरी देने से मना कर रहा था।
हाईकोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन माना। खंडपीठ ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य पीड़ित परिवार को तत्काल सहायता प्रदान करना है। विश्वविद्यालय ने इस नीति को चुनिंदा तरीके से लागू करके याचिकाकर्ता के साथ अन्याय किया है।
खंडपीठ ने एकल पीठ के 11 मई 2026 के निर्णय को सही ठहराया। इसमें विश्वविद्यालय को निर्देश दिए गए थे कि याचिकाकर्ता को उन अन्य आश्रितों की तारीख से अनुकंपा नियुक्ति की पेशकश की जाए, जिन्हें याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु के बाद नौकरी दी गई थी। याचिकाकर्ता को वरिष्ठता का लाभ और मौद्रिक लाभ आदेश की तारीख से देय होंगे। यदि विश्वविद्यालय समय पर भुगतान करने में विफल रहता है तो उसे 6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा।
2014 में पिता की मौत, 2015 में आवेदन खारिज
मामला वर्ष 1982 से विश्वविद्यालय में जूनियर तकनीशियन के पद पर कार्यरत जगदीश सिंह से जुड़ा है। उनका निधन 7 जनवरी 2014 को हो गया था। इसके बाद उनके पुत्र राजू ने 11 सितंबर 2014 को अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था।
विश्वविद्यालय ने 4 नवंबर 2015 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उसके पास चतुर्थ श्रेणी के सरप्लस यानी अतिरिक्त कर्मचारी हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने आरटीआई के माध्यम से विश्वविद्यालय से जानकारी जुटाई।
RTI से सामने आया 47 नियुक्तियों का मामला
आरटीआई के तहत मिली जानकारी से सामने आया कि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2014 से 2023 के बीच 47 लोगों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्तियां दी थीं। इनमें कई नियुक्तियां ऐसे कर्मचारियों के आश्रितों को दी गई थीं, जिनकी मृत्यु याचिकाकर्ता के पिता के निधन के बाद हुई थी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि विश्वविद्यालय की ओर से अनुकंपा नियुक्ति की नीति को समान रूप से लागू नहीं किया गया। अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अनुकंपा नियुक्ति में समानता के सिद्धांत का पालन करने पर जोर दिया है।




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