Sirmaur: 40 हजार श्रद्धालुओं का सैलाब, जयकारों से गूंजा हिमाचल: छत्रधारी चालदा महासू महाराज की ऐतिहासिक देव यात्रा

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छत्रधारी चालदा महासू महाराज की ऐतिहासिक देव यात्रा के हिमाचल प्रदेश में प्रवेश के साथ ही उत्तराखंड-हिमाचल की अंतर्राज्यीय सीमा मीनस पर आस्था और श्रद्धा का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। जैसे ही महाराज हजारों श्रद्धालुओं के विशाल काफिले के साथ देवभूमि में दाखिल हुए, पूरा सीमा क्षेत्र जयकारों और धार्मिक उल्लास से गूंज उठा।

शनिवार और रविवार की मध्यरात्रि करीब तीन बजे छत्रधारी चालदा महासू महाराज द्राबिल पहुंचे। यहां स्थानीय मंदिर में पूजे जाने वाले देवताओं और महाराज के बड़े भ्राता भोठा महासू महाराज की पालकी ने पारंपरिक विधि-विधान के साथ उनका स्वागत किया। इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने के लिए क्षेत्र सहित उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से लगभग 40 हजार श्रद्धालु द्राबिल पहुंचे।

शनिवार शाम करीब पांच बजे से श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं की संख्या अत्यधिक होने के कारण देर रात तक भोजन स्थल पर जगह नहीं बची। इसके बाद आयोजन समिति ने राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-707 पर भी भोजन वितरण की व्यवस्था की। सेवा और समर्पण का यह क्रम पूरी रात चलता रहा। इसी दौरान छत्रधारी चालदा महासू महाराज का भव्य जगराता आयोजित हुआ, जिसमें देव परंपराओं, महासू पूजा और भजन-कीर्तन ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। रविवार तड़के से ही श्रद्धालुओं का सैलाब दर्शन के लिए उमड़ पड़ा और हजारों लोगों ने महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया।

रविवार दोपहर करीब दो बजे छत्रधारी चालदा महासू महाराज द्राबिल से पश्मी गांव में तैयार किए गए भव्य मंदिर के लिए रवाना हुए। रात्रि के समय महाराज का काफिला शिलाई बाजार पहुंचा, जहां स्वागत का दृश्य अत्यंत भव्य और ऐतिहासिक रहा। शिमला, सोलन और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शिलाई पहुंचे। बाजार क्षेत्र में जगह कम पड़ गई और दर्शन की लालसा में श्रद्धालु दुकानों की छतों तक पर चढ़ गए।

ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और गूंजते जयघोष के बीच पूरा शिलाई क्षेत्र भक्ति और उत्सव में डूबा नजर आया। छत्रधारी चालदा महासू महाराज की यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी, बल्कि क्षेत्र की समृद्ध देव संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक एकता को भी सशक्त रूप से सामने लाती दिखी। श्रद्धालुओं का कहना है कि यह देव यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐतिहासिक स्मृति के रूप में हमेशा याद रखी जाएगी।

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