Mandi: हिमाचल में कुदरत का कहर: मंडी में 15 बादल फटे, 18 मौतें और करोड़ों की तबाही

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हिमाचल प्रदेश में आई प्राकृतिक आपदा ने लोगों के जीवन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। मंडी जिले में एक के बाद एक 15 बादल फटने की घटनाओं ने इलाके को बुरी तरह तबाह कर दिया। पूरे राज्य में कुल 17 जगहों पर बादल फटे, जिनमें से 15 मंडी जिले में और एक-एक कुल्लू व किन्नौर जिले में दर्ज की गई हैं। लगातार बारिश, भूस्खलन और ब्यास नदी के उफान ने मंडी को सबसे अधिक प्रभावित किया है, जहां कई घर मलबे में दब गए और नदी का पानी रिहायशी इलाकों में घुस आया, जिससे हर ओर अफरा-तफरी मच गई।

इस त्रासदी में अब तक 18 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से 16 लोग केवल मंडी जिले से हैं। 33 लोग अब भी लापता हैं और दर्जनों घायल हैं। राहत और बचाव दलों ने अब तक 332 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है। मंडी जिले में ही 24 मकान और 12 गोशालाएं पूरी तरह से जमींदोज हो गई हैं, जबकि 30 मवेशियों की भी मौत हुई है। कुकलाह के पास स्थित पटीकरी प्रोजेक्ट भी सैलाब की चपेट में आ गया है, और कई पुल बह जाने से इलाके का संपर्क टूट गया है।

करसोग क्षेत्र में तबाही का मंजर सबसे भयानक रहा, जहां बादल फटने से पुराना बाजार, पंजराट, कुट्टी, बरल, सकरोल और सनारली जैसे गांव बुरी तरह प्रभावित हुए। रात के अंधेरे में जब पानी और मलबा तेजी से गांवों की ओर बढ़ा, तो लोग डर और घबराहट में अपने घरों से निकलकर मदद के लिए पुकारते रहे। प्रशासन भी पानी की रफ्तार के सामने बेबस नजर आया, लेकिन बहाव कम होने के बाद फंसे लोगों को बाहर निकाला गया।

सकरोल के रहने वाले कामेश्वर ने बताया कि रात लगभग 11 बजे पानी धीरे-धीरे आना शुरू हुआ, लेकिन अचानक इसकी गति इतनी तेज हो गई कि उनका ढाबा, कई गाड़ियां और एक व्यक्ति पानी में बह गया। उन्होंने बताया कि उनके तीन मकान भी इस सैलाब में समा गए और उन्हें करीब दो करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वहीं, कुट्टी गांव के निवासी तेतू ने बताया कि रात 12 बजे पहले पहाड़ी से पानी आया, और फिर पत्थर गिरने लगे। कुछ ही मिनटों में चारों ओर मलबा फैल गया और उनकी दुकान पानी में बह गई।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। स्यांज पंचायत के प्रधान मनोज शर्मा ने आरोप लगाया कि सोमवार रात को ही प्रशासन को जानकारी दे दी गई थी, लेकिन सर्च ऑपरेशन 12 घंटे बाद शुरू हुआ। तब तक पंगलियुर गांव पूरी तरह मलबे में दब चुका था। कई लोगों को नींद से जागने का मौका तक नहीं मिला और उनके घर मिट्टी में मिल गए। गांवों के लोग अंधेरे में डर और उम्मीद के बीच पूरी रात बिताने को मजबूर रहे।

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