शाहपुर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शाहपुर के अभिनंदन मैरिज पैलेस में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस कथा व्यास साध्वी भाग्यश्री भारती जी ने भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी जी के विवाह प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी जी का विवाह कोई साधारण विवाह नहीं था, बल्कि यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। साध्वी जी ने बताया कि रुक्मणी जी जीवात्मा और भगवान श्री कृष्ण परमात्मा के प्रतीक हैं। यह मिलन तब संभव हुआ, जब मध्य में ब्राह्मण देव रूपी गुरु आए। उन्होंने कहा कि गुरु ही वह माध्यम हैं, जो मनुष्य के अंतःकरण में ईश्वर का साक्षात्कार करवाकर आत्मा का परमात्मा से मिलन करा सकते हैं।
साध्वी भाग्यश्री भारती जी ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मणी जी की प्रार्थना सुनी और उसे पूरा किया, क्योंकि भगवान श्री कृष्ण नारी उद्धारक हैं और वह किसी नारी पर अत्याचार होते हुए नहीं देख सकते। उन्होंने कहा कि आज समाज में नारी की स्थिति को देखें तो कई जगह वह शोषण, हिंसा, अपहरण और दहेज जैसी कुरीतियों का सामना कर रही है। कहीं उसे केवल भोग की वस्तु समझा जाता है तो कहीं उसके साथ बेहद अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। ऐसे में समाज में नारी के प्रति जागरूकता पैदा करना बेहद जरूरी है।
साध्वी जी ने बताया कि श्रीगुरु आशुतोष महाराज जी ने समाज में महिलाओं की ऐसी स्थिति को देखते हुए संस्थान की ओर से महिलाओं के लिए ‘संतुलन’ नामक प्रकल्प शुरू किया। यह प्रकल्प महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न और हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने का कार्य करता है। इसके तहत समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को जागरूक करने का प्रयास किया जाता है। साथ ही महिलाओं को ब्रह्मज्ञान के माध्यम से आंतरिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है। साध्वी जी ने कहा कि जब एक नारी भीतर से जागरूक और सशक्त होगी तो वह स्वयं अपनी स्थिति में सुधार ला सकेगी। उन्होंने कहा कि केवल महिलाओं ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को जागृति के लिए ब्रह्मज्ञान की आवश्यकता है।
कथा के दौरान यजमान पूजन भी किया गया। इसके अलावा ज्योति प्रज्वलित करने की रस्म भी निभाई गई। कथा के उपरांत ज्योति प्रज्वलन कार्यक्रम में शाहपुर के विधायक केवल सिंह पठानिया, राजीव पटियाल, वी.पी. शर्मा, भरत शर्मा, रमेश धीमान, श्रीकंठ, डॉ. श्रीकांत लगवाल, जितेन्दर सोंधी और गोकुल सोंधी ने ज्योति प्रज्वलित की। इसके बाद सभी भक्तों ने आरती में भाग लिया और प्रसाद ग्रहण किया।




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