Kangra: धौलाधार की वादियों से निकलकर देशभर में छाया ‘लुंगडु’, स्वाद के साथ सेहत का भी सुपरफूड

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शाहपुर, 19 मई 2026: हिमाचल प्रदेश की हरी-भरी वादियों और धौलाधार की पहाड़ियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला “लुंगडु” इन दिनों लोगों के बीच खास आकर्षण बना हुआ है। गर्मियों के मौसम में मिलने वाला यह जंगली पौधा सिर्फ एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, परंपरा, स्वास्थ्य और आजीविका का अहम हिस्सा माना जाता है। हिमाचल के कई क्षेत्रों में इसे “लिंगड़” और “खसरोड़” के नाम से भी जाना जाता है। अप्रैल से सितंबर तक मिलने वाला यह पौधा अपने औषधीय गुणों और अनोखे स्वाद के कारण लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार लुंगडु में विटामिन-ए, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स, आयरन, फोलिक एसिड और फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो शरीर के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम डिप्लाजियम मैक्सिमम है। पहाड़ी इलाकों में वर्षों से इसे पारंपरिक भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसकी सब्जी और अचार दोनों काफी लोकप्रिय हैं। कच्चे रूप में इसमें हल्का कसैलापन होता है, जो उबालने के बाद खत्म हो जाता है।

कांगड़ा जिला के शाहपुर क्षेत्र के धारकण्डी, करेरी, बोह और सल्ली समेत धौलाधार की ऊंची पहाड़ियों में यह बड़ी मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा धर्मशाला, पालमपुर, बैजनाथ और बरोट-भंगाल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी लोग इसे जंगलों से इकट्ठा करते हैं। स्थानीय ग्रामीण सुबह-सुबह कई किलोमीटर की कठिन चढ़ाई चढ़कर लुंगडु तोड़ते हैं और पीठ पर ढोकर बाजारों तक पहुंचाते हैं।

शाहपुर के बोह क्षेत्र की रहने वाली कांता देवी और गुडो देवी बताती हैं कि एक व्यक्ति प्रतिदिन 10 से 15 किलो तक लुंगडु इकट्ठा कर लेता है। इसके बाद इसे बंडलों में बांधकर बाजार में बेचा जाता है। उन्होंने बताया कि पहले ग्रामीण लोग इसे गांव-गांव जाकर अनाज के बदले बेचते थे, लेकिन अब बाजारों में इसकी अच्छी कीमत मिलने लगी है। औषधीय गुणों और बढ़ती मांग के कारण शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में लोग इसका बेसब्री से इंतजार करते हैं।

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अब लुंगडु सिर्फ घरों की रसोई तक सीमित नहीं रहा। “लुंगडु का मदरा” कांगड़ी धाम और कई सामाजिक समारोहों का खास हिस्सा बन चुका है। वहीं, स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार किया जा रहा इसका अचार भी काफी लोकप्रिय हो रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह पौधा स्वाद, सेहत, संस्कृति और रोजगार—चारों का अनोखा संगम है।

हिमाचल की वादियों में उगने वाला “लुंगडु” आज भी पहाड़ी लोगों की मेहनत, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी को जीवंत बनाए हुए है। यही वजह है कि यह प्राकृतिक उपहार अब हिमाचल की पहचान बनता जा रहा है।

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