चंबा जिले की करवाल पंचायत आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। आज़ादी के करीब 80 साल बीत जाने के बाद भी यहां के लोगों की ज़िंदगी कठिन हालातों में गुजर रही है। गांव के ग्रामीणों को रोज़मर्रा का सामान लाने और बीमार मरीजों को इलाज के लिए पीठ पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि क्या पहाड़ी इलाकों के लोगों की ज़िंदगी सरकार के विकास एजेंडे में शामिल नहीं है।
आपात स्थिति में समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण यहां जान का खतरा हमेशा बना रहता है। महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। सड़क न होने की कीमत ग्रामीण अपनी सेहत और कई बार जान देकर चुका रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह हालात किसी एक दिन या साल के नहीं, बल्कि दशकों की अनदेखी का नतीजा हैं।
ग्रामीणों के अनुसार गडलेई–टिक्कर सड़क निर्माण को लेकर वर्ष 2018-19 में स्वीकृति मिल चुकी थी। विकास कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कई भूमि मालिकों ने स्वेच्छा से अपनी जमीन भी दान कर दी थी, जिसकी औपचारिक सहमति संबंधित विभागों के पास दर्ज है। इसके बावजूद सड़क निर्माण का काम आज तक शुरू नहीं हो पाया है।
करीब 600 से अधिक की आबादी वाली करवाल पंचायत के लोग आज भी अस्पताल, स्कूल, बाजार और प्रशासनिक कार्यालयों तक पहुंचने के लिए जोखिम भरा सफर तय करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार शिकायतें और ज्ञापन सौंपे, लेकिन प्रशासन की ओर से सिर्फ आश्वासन ही मिले, ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अब ग्रामीण सरकार और प्रशासन से सीधे सवाल पूछ रहे हैं कि जब सड़क की स्वीकृति है, जमीन उपलब्ध है और जरूरत भी साफ है, तो फिर निर्माण कार्य क्यों नहीं हुआ। फाइलें किस स्तर पर अटकी हैं और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि उनका बुनियादी अधिकार है और इसे जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए।
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