हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को बड़ी पहचान मिली है। राज्य के तीन प्रसिद्ध पारंपरिक उत्पादों—हिमाचल रणसिंघा, हिमाचल काष्ठ नक्काशी शिल्प और हिमाचल हस्तनिर्मित गलीचा—को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। इसे राज्य की समृद्ध कला, शिल्पकला और स्वदेशी ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। नाबार्ड हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय कार्यालय ने स्थानीय उत्पादक समूहों, कारीगरों और अन्य हितधारकों के सहयोग से इन उत्पादों के जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी करवाई। इस पहल का उद्देश्य इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखना, बाजार में उनकी साख बढ़ाना और कारीगरों को बेहतर आर्थिक लाभ दिलाना है।
हिमाचल रणसिंघा राज्य के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में उपयोग होने वाला एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जिसकी अपनी अलग पहचान है। वहीं हिमाचल काष्ठ नक्काशी शिल्प अपनी बारीक कारीगरी और पारंपरिक डिजाइनों के लिए जाना जाता है, जो प्रदेश की समृद्ध कला परंपरा को दर्शाता है। इसके अलावा हिमाचल हस्तनिर्मित गलीचा राज्य की पारंपरिक बुनाई कला का उत्कृष्ट उदाहरण है और कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन भी बना हुआ है।

जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों के नाम और पहचान के दुरुपयोग पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही असली हिमाचली उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी, बाजार तक उनकी पहुंच मजबूत होगी और उपभोक्ताओं का भरोसा भी बढ़ेगा। इसका सीधा लाभ इनसे जुड़े कारीगरों और उत्पादक समुदायों को मिलने की उम्मीद है।
इस अवसर पर नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक डॉ. विवेक पठानिया ने कहा कि यह उपलब्धि हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने और पारंपरिक कारीगरों को सशक्त बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने बताया कि नाबार्ड भविष्य में भी मूल्य श्रृंखला विकास, ब्रांडिंग, बाजार संपर्क और कौशल विकास के माध्यम से इन उत्पादों और कारीगरों को सहयोग देता रहेगा। उन्होंने उप महाप्रबंधक कुशल दीप और सहायक प्रबंधक हिमांशु बालियान के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उनके समन्वय और मेहनत से यह महत्वपूर्ण पंजीकरण संभव हो सका।
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