हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में चार वर्षीय मासूम युग गुप्ता की जघन्य हत्या के मामले में पीड़ित परिवार ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए अब उच्चतम न्यायालय का रुख किया है। इस मामले में उच्च न्यायालय ने 23 सितम्बर, 2025 को अपने फैसले में दो दोषियों की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था, जबकि तीसरे दोषी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
युग के पिता विनोद गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है, जिसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया है। मामला district एवं सत्र न्यायालय में 5 सितम्बर, 2018 को चला था, जहां चंद्र शर्मा, विक्रांत बक्शी और तेजिंदर पाल को युग के अपहरण, यातना और हत्या का दोषी ठहराते हुए सभी को मौत की सजा सुनाई गई थी।
यह दोषसिद्धि 100 से अधिक गवाहों के बयानों और सीआईडी की 2,300 पन्नों की चार्जशीट पर आधारित थी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से यह सिद्ध नहीं होता कि दोषी सुधार की गुंजाइश से परे हैं। इसलिए चंद्र शर्मा और विक्रांत बक्शी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया, जबकि तेजिंदर पाल को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
युग के परिवार ने इस फैसले पर गहरा दुख व्यक्त किया। उनका कहना है कि तेजिंदर के बरी होने से न्याय की भावना ठेस पहुंची है क्योंकि उसने कथित तौर पर युग को बंधक बनाकर रखा और गत्ते के बक्से में ले जाने में मदद की थी। परिवार ने मांग की है कि तेजिंदर को पासपोर्ट जारी न किया जाए और चंद्र शर्मा को पैरोल न मिले।
विनोद गुप्ता ने कहा कि 11 साल के संघर्ष के बावजूद उनका परिवार मानता है कि उनके बेटे के लिए न्याय दोषियों को फांसी देने से ही पूरा हो सकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि सुप्रीम कोर्ट निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को बहाल करेगा। याद रहे कि 2014 में चार वर्षीय युग गुप्ता का अपहरण किया गया था और उसे जबरन शराब पिलाकर नगर निगम के पानी के टैंक में बांध कर मार दिया गया था।
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