हिमाचल प्रदेश सरकार ने घाटे में चल रहे पर्यटन विकास निगम (एचपीटीडीसी) के 14 होटलों को निजी क्षेत्र को सौंपने का फैसला लिया है। सरकार ने यह निर्णय 28 जून को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिया, जिसके बाद पर्यटन विभाग ने इस फैसले को लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव ने पर्यटन निगम के प्रबंध निदेशक को निर्देश दिए हैं कि जल्द से जल्द इन होटलों को ऑपरेशन और मेंटीनेंस के लिए निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया को पूरा किया जाए।
सरकार के इस निर्णय के बाद पर्यटन निगम के कर्मचारियों में भारी असंतोष फैल गया है। कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय से इन होटलों के निजीकरण की चर्चा चल रही थी, लेकिन अब सरकार ने इसे वास्तविक रूप देने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इससे सबसे बड़ी चिंता इन होटलों में कार्यरत स्थायी और अनुबंध कर्मचारियों के भविष्य को लेकर है। अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि निजी ऑपरेटर इन कर्मचारियों को अपने साथ रखेंगे या नहीं, और उनकी सेवा शर्तें क्या होंगी।
इन 14 होटलों में शामिल हैं—होटल हिल टॉप (स्वारघाट), होटल लेकव्यू (बिलासपुर), होटल भागल (दाड़लाघाट), वेसाइड एमेनिटी (भराड़ीघाट), होटल ममलेश्वर (चिंदी), होटल एप्पल ब्लॉसम (फागु), होटल शिवालिक (परवाणू), होटल गिरीगंगा (खड़ापत्थर), होटल चांशल (रोहड़ू), टूरिस्ट इन (राजगढ़), होटल सरवरी (कुल्लू), होटल ओल्ड रोसकॉमन (कसौली), कश्मीर हाउस (धर्मशाला) और होटल उहल (जोगिंद्रनगर)। ये सभी होटल लंबे समय से घाटे में चल रहे हैं, जिनके संचालन को लाभकारी बनाने के लिए सरकार द्वारा पहले भी कई प्रयास किए गए थे, लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
हालांकि, कर्मचारियों का यह भी कहना है कि हाल के महीनों में पर्यटन निगम की आय में सुधार देखने को मिला है। ऐसे में जब राजस्व बढ़ रहा है, तो होटलों को निजी हाथों में देने का निर्णय उनके अनुसार अनुचित है। यूनियन नेताओं का मानना है कि यह फैसला सरकारी संपत्तियों को सस्ते में निजी कंपनियों को सौंपने की मंशा को दर्शाता है।
पर्यटन निगम कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी राज कुमार ने सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि यूनियन इस आदेश का हर स्तर पर विरोध करेगी और जल्द ही आंदोलन की रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों के हितों की अनदेखी करते हुए यदि निजीकरण किया गया, तो इसका जोरदार विरोध होगा।
वहीं, पर्यटन निगम के निदेशक राजीव ने बताया कि यह निर्णय पूरी तरह राज्य कैबिनेट का है और फिलहाल यह तय होना बाकी है कि होटलों को निजी क्षेत्र को किस प्रक्रिया के तहत सौंपा जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर विस्तृत निर्णय लिया जाएगा, ताकि उनकी नौकरी और अधिकारों की रक्षा की जा सके।
सरकार का तर्क है कि इन होटलों को घाटे से उबारने के लिए निजी ऑपरेटर्स के माध्यम से बेहतर संचालन और रखरखाव जरूरी है। लेकिन दूसरी ओर, कर्मचारियों का मानना है कि यह निर्णय जल्दबाज़ी में लिया गया है और इससे उनकी रोज़गार सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में सरकार को इस मुद्दे पर कर्मचारियों से संवाद कर कोई स्पष्ट नीति बनानी होगी, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का बड़ा आंदोलन न खड़ा हो।
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