Himachal: 49 हजार करोड़ की ग्रांट बंद होना हिमाचल के लिए काला दिन, केंद्र के बजट पर CM सुक्खू का तीखा हमला

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों में राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को समाप्त किए जाने पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे हिमाचल प्रदेश के हितों पर सीधा कुठाराघात बताया है। शिमला में आयोजित पत्रकार वार्ता में मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल को मिलने वाली करीब 49 हजार करोड़ रुपये की ग्रांट का बंद होना प्रदेश के इतिहास का काला दिन है। उन्होंने कहा कि यह अनुदान संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत दिया जाता रहा है और इसे अचानक खत्म करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि संघीय ढांचे की भावना के भी खिलाफ है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस फैसले से प्रदेश के लोगों के दिलों को गहरी ठेस पहुंची है। गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हिमाचल को केंद्र सरकार ने मानो छुनछुना थमा दिया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पिछले 70 वर्षों से मिल रही यह ग्रांट बंद कर दी जाएगी। इसका सीधा असर किसान-बागवानों, मजदूरों और आम जनता पर पड़ेगा। मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने चार-चार बार केंद्रीय वित्त मंत्री और 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष से आग्रह किया था कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष 10 हजार करोड़ रुपये की आरडीजी ग्रांट दी जाए, ताकि पांच वर्षों में राज्य को 50 हजार करोड़ रुपये मिल सकें, लेकिन इसके उलट इस सहायता को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने केंद्रीय बजट 2026-27 को हिमाचल प्रदेश के लिए निराशाजनक और अन्यायपूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1952 से लेकर 15वें वित्त आयोग तक केंद्र सरकार राज्यों को नियमित रूप से राजस्व घाटा अनुदान देती रही है, लेकिन 16वें वित्त आयोग द्वारा इसे बंद करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए बजट में किए गए प्रावधान हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए नाकाफी हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियां और खेती की लागत मैदानी राज्यों से कहीं अधिक है। मुख्यमंत्री ने सेब उत्पादकों का जिक्र करते हुए कहा कि यह क्षेत्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लगभग 5 हजार करोड़ रुपये का योगदान देता है और हजारों परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले ही बजट में पूंजी निवेश की बात कर रही हो, लेकिन हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा प्रबंधन, सड़क और रेल कनेक्टिविटी, जलविद्युत परियोजनाओं, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कोई ठोस या विशेष सहायता दिखाई नहीं देती। हिमालयी राज्यों के लिए अलग आपदा जोखिम सूचकांक और पारिस्थितिक संकेतकों को वित्तीय वितरण में प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह बजट न तो विकास का रास्ता दिखाता है और न ही न्याय का, बल्कि यह जन-विरोधी, किसान-विरोधी और हिमाचल-विरोधी है।

मुख्यमंत्री ने बौद्ध सर्किट के मुद्दे पर भी केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बौद्ध सर्किट का प्रस्ताव स्वागत योग्य है, लेकिन विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों वाले हिमाचल प्रदेश को इससे बाहर रखना साफ तौर पर भेदभाव को दर्शाता है। पर्वतीय मार्गों के विकास की घोषणा जरूर की गई है, लेकिन इसके वास्तविक लाभ को भविष्य के अस्पष्ट दिशा-निर्देशों पर छोड़ दिया गया है।

रेल परियोजनाओं को लेकर भी मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि भानुपल्ली-बिलासपुर और बद्दी-चंडीगढ़ जैसी अहम रेल परियोजनाओं के लिए बजट में कोई धन आवंटित नहीं किया गया। नंगल-तलवाड़ा रेलवे लाइन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह परियोजना वर्ष 1971 से अब तक तलवाड़ा नहीं पहुंच पाई है। उन्होंने यह भी कहा कि बिलासपुर के लिए प्रदेश सरकार ने 25 प्रतिशत और बद्दी परियोजना के लिए 50 प्रतिशत हिस्सा दिया, इसके बावजूद काम आगे नहीं बढ़ सका।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि वह आरडीजी ग्रांट की बहाली के लिए भाजपा सांसदों और नेताओं के नेतृत्व में भी केंद्र सरकार से मिलने को तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह राजनीति का विषय नहीं, बल्कि प्रदेश के हितों की लड़ाई है और इसमें सभी को एकजुट होकर काम करना चाहिए।

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