आज जब पहाड़ों में सुरंगें बनाने के लिए भारी मशीनें, आधुनिक तकनीक और सरकारी बजट इस्तेमाल होते हैं, तो यह काम आम लगने लगा है। लेकिन जरा उस दौर की कल्पना कीजिए, जब न बिजली थी, न मशीनें और न ही किसी तरह की सरकारी मदद। उसी समय चंबा जिले के दुर्गम चुराह क्षेत्र के चांजू गांव में रहने वाले एक साधारण व्यक्ति राधा ने वह कर दिखाया, जिसे आज भी असाधारण माना जाता है।
1950 के दशक में चांजू और आसपास के गांवों का जीवन पूरी तरह घराटों यानी पानी से चलने वाली पनचक्कियों पर निर्भर था। अनाज पीसने का यही एकमात्र साधन था। लेकिन मानसून आते ही हालात बिगड़ जाते थे। नालों में आई बाढ़ से घराट बह जाते थे और लोगों को साल के चार महीने अनाज पीसने के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। कई बार तो आटे के बिना ही गुजर-बसर करनी पड़ती थी। गांव वालों की इस मजबूरी ने राधा को भीतर तक झकझोर दिया और उन्होंने इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने का संकल्प लिया।

राधा ने तय किया कि नाले के पानी को ऐसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जाए, जहां बाढ़ का खतरा न हो। लेकिन इस रास्ते में एक विशाल पहाड़ी दीवार बनकर खड़ी थी। जब राधा ने सिर्फ छैनी और हथौड़े के सहारे पहाड़ काटने का फैसला लिया, तो लोग उनका मजाक उड़ाने लगे। एक अकेला इंसान पहाड़ काट सकता है, यह बात लोगों को पागलपन लगी। बावजूद इसके राधा अपने फैसले पर अडिग रहे और पीछे मुड़कर नहीं देखा।
1963 में राधा ने बिना किसी आधुनिक उपकरण के पहाड़ को काटना शुरू किया। अंधेरी गुफा, कठोर पत्थर और अकेलेपन के बीच उन्होंने चार साल तक लगातार संघर्ष किया। आखिरकार 1967 में जब सुरंग के दूसरे सिरे से पानी की पहली धार निकली, तो पूरा क्षेत्र हैरान रह गया। करीब 60 मीटर लंबी इस सुरंग ने नाले के पानी को सुरक्षित रूप से घराटों तक पहुंचा दिया। इससे न केवल साल भर अनाज पीसने की समस्या खत्म हो गई, बल्कि उसी तेज बहाव से लकड़ी काटने का आरा भी चलाया जाने लगा, जो उस समय बड़ी उपलब्धि थी।
राधा का यह संघर्ष बिहार के दशरथ मांझी से किसी भी मायने में कम नहीं था। जहां दशरथ मांझी ने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया, वहीं चुराह के राधा ने पहाड़ के भीतर सुरंग बनाकर पूरे क्षेत्र की आजीविका को सुरक्षित कर दिया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि दशरथ मांझी को देशभर में पहचान मिली, जबकि राधा आज भी इतिहास के पन्नों में गुमनाम हैं।
चार साल तक भूख-प्यास की परवाह किए बिना पहाड़ से जूझने वाले राधा ने आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश की, जो आज के दौर में भी प्रेरणा देती है। न मशीन थी, न बिजली, न कोई बजट और न सरकारी सहायता। उनके पास बस एक मजबूत इरादा था, लोगों को भूख और परेशानियों से बचाने का। चांजू के राधा की यह सुरंग आज भी उनके अदम्य साहस और संकल्प की गवाही देती है।
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