Shimla: एशिया के सबसे घने जंगल में 200 दुर्लभ मशरूम की खोज, शिमला के इस सरकारी स्कूल ने कर दिखाया कमाल

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शिमला जिले का छोटा सा कस्बा चियोग इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चा में है। यहां स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला चियोग पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी प्रयोगशाला बन चुकी है। क्लाइमेट स्मार्ट स्कूल का दर्जा प्राप्त इस स्कूल के छात्रों ने वह काम कर दिखाया है, जो बड़े शोधकर्ताओं के लिए भी चुनौती माना जाता है। स्कूल के गुलमोहर इको क्लब के विद्यार्थियों ने स्कूल से सटे एशिया के सबसे घने जंगल में मानसून की नमी के बीच जंगली मशरूम की 200 से अधिक दुर्लभ प्रजातियों की पहचान करने का दावा किया है।

छात्रों ने सिर्फ मशरूम खोजने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि जियो-टैगिंग के माध्यम से उनका वैज्ञानिक रिकॉर्ड भी तैयार किया है। देवदार के पेड़ों, सूखी लकड़ियों और दीमक के टीलों पर पाए गए इन मशरूमों में औषधीय गुणों से भरपूर किस्मों से लेकर बेहद जहरीली प्रजातियां भी शामिल हैं। जीपीएस तकनीक की मदद से अब इन मशरूमों की सटीक लोकेशन और प्रजातियों को डिजिटल मानचित्र पर ट्रैक किया जा सकता है, जिससे भविष्य में शोध कार्य में भी सहायता मिलेगी।

इको क्लब की प्रभारी सविंता चौहान बताती हैं कि बच्चों का पौधों के साथ गहरा जुड़ाव हो गया है। वे कहते हैं कि पत्तों की सरसराहट पौधों की भावनाएं हैं। स्कूल के हर्बल गार्डन में एलोवेरा, सौंफ और अजवाइन समेत 100 से अधिक औषधीय पौधों की प्रजातियां लगाई गई हैं। क्लब गौरैया संरक्षण के लिए भी सक्रिय है और स्कूल परिसर में 10 कृत्रिम घोंसले लगाए गए हैं, जहां अब पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देने लगी है।

प्रधानाचार्य संदीप कुमार शर्मा का कहना है कि उनका उद्देश्य बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें मिट्टी और अपनी जड़ों से जोड़ना है। उनका मानना है कि जब बच्चा एक पौधे को बचाने की कला सीख जाता है तो वह अपने आप जिम्मेदार नागरिक बन जाता है।

स्कूल की इस उपलब्धि के पीछे प्रधानाचार्य की दूरदर्शी सोच भी अहम भूमिका निभा रही है। उन्होंने शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए एक अनूठी पहल की। पहले स्कूल के टॉपर 65 से 70 प्रतिशत अंक लाते थे, लेकिन जब से उन्होंने टॉपर्स को अपने निजी खर्च पर हवाई यात्रा कराने का वादा किया, तब से प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ी कि अब छात्र 95 प्रतिशत से अधिक अंक ला रहे हैं। इतना ही नहीं, एक पूर्व छात्र और स्थानीय निवासी होने के नाते उन्होंने अपनी जेब से 10 लाख रुपये खर्च कर स्कूल का एक ब्लॉक बनवाया और उसे विभाग को समर्पित कर दिया।

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