हिमाचल प्रदेश के नाहन स्थित किशोर न्याय बोर्ड ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दोषी पाए गए एक किशोर को जेल भेजने के बजाय सुधार का अवसर दिया गया है। बोर्ड के प्रधान मजिस्ट्रेट विकास कपूर की अध्यक्षता वाली पीठ ने आरोपी को एक वर्ष की परिवीक्षा पर उसकी मां की देखरेख में रहने का आदेश दिया है।
यह मामला 8 फरवरी 2022 को शिलाई थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था। पीड़िता के परिजनों का आरोप था कि आरोपी ने उनकी नाबालिग बेटी को पांवटा साहिब ले जाकर शारीरिक संबंध बनाए। पुलिस ने आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 376 (दुष्कर्म) और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया। सुनवाई के दौरान कुल 23 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। किशोर न्याय बोर्ड ने पाया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 वर्ष और आरोपी की उम्र मात्र 15 वर्ष थी। आदेश में कहा गया कि संबंध सहमति से थे, लेकिन 18 वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ सहमति से बने संबंध कानून के अनुसार दुष्कर्म की श्रेणी में आते हैं।
बोर्ड ने पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव और सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट (SIR) के आधार पर आरोपी को अपहरण के आरोपों से बरी कर दिया। रिपोर्ट में आरोपी का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं पाया गया। बोर्ड ने सुधारात्मक न्याय के सिद्धांत को प्राथमिकता देते हुए आरोपी को अपनी मां की देखरेख में एक वर्ष की अवधि के लिए अच्छे आचरण की शर्त पर रिहा किया। इसके साथ ही अधीक्षक-सह-परिवीक्षा अधिकारी को आरोपी की नियमित निगरानी और मार्गदर्शन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला किशोर न्याय प्रणाली के मूल उद्देश्य को दर्शाता है, जिसमें बच्चों और किशोरों को अपराधी के रूप में देखने के बजाय उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने पर जोर दिया जाता है। एक वर्ष की परिवीक्षा अवधि पूरी होने के बाद बोर्ड आरोपी की प्रगति रिपोर्ट की समीक्षा करेगा।
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